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यहाँ ताली एक हाथ से ही बजती है ।

Posted On 9 Oct, 2016 में

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21 वी सदी का भारत , वैज्ञानिक सोच वाला भारत, अन्तरिक्ष के शिखरों तक अपनी पहुँच बढ़ाने वाला भारत न जाने ऐसी कितनी ही उपाधियों से हम अपने देश का गुणगान करते है और आज भी उसे विश्वगुरु मानते है लेकिन क्या वाकई मे हम आज विश्वगुरु है ? नवरात्रों मे देवी माँ की उपासना अधिकांश भारतीयों के घरों मे धूम – धाम से होती है और शक्ति की प्रतीक देवी माँ का गुणगान भी हर घर मे होता है लेकिन अफसोस ये गुणगान एंव सम्मान घर तक ही सीमित रह जाता है । घर के बाहर निकलते ही अधिकांश लोगो के लिए स्त्रियों के सम्मान की परिभाषा ही बदल जाती है , जो घर तक देवी माँ के भक्त होते है उन्हें ही बाहर आकर महिषासुर का रुप लेने मे तनिक देर का भी समय नही लगता है । उनके लिए घर वाली देवी माँ अलग होती है और पंडालो वाली देवी माँ अलग होती है तभी तो पंडालो मे देवी माँ के सामने छेड़छाड़ जैसी ओछी घटना करने उनको शर्म भी नही आती है । हर्ष और उल्लास के साथ नवरात्री मे धूम-धाम से किया जाने वाला गरबा नृत्य का समारोह स्थल तो इन महिषासुर का सबसे पंसदीदा जगह बनता जा रहा है और वहाँ ये महिषासुर अपने अपको को इतना स्वच्छंद समझ बैठते है कि भूल जाते है कि देवी के पास शक्ति भी है और अगर वे अपनी शक्ति दिखाने पर आ गई तो उनका विनाश फिर निश्चित ही है ।

हमारे समाज मे कितना दोगलापन है इस बात का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि समाज मे हर साल नवरात्री आती है और समाज मे हर नवरात्री मे स्त्री के सम्मान की बात कह उसके सम्मान का प्रण लिया जाता है लेकिन कोशिश पूरी की जाती है कि ये प्रण , प्रण ही रहे और वास्तविक जीवन मे क्रियान्वित न हो । समाज मे आज भी एक बड़ा तबका ऐसा सोचता है कि लड़कियों के छोटे कपड़े पहनने से पुरुष उत्तेजित हो जाते है और छेड़छाड़ जैसी छोटी और आम घटना को अन्जाम दे देते है । और इन घटनाओं मे अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए पुरुषों द्वारा बड़े ही अच्छे ठंग से दुहाई दे दी जाती है कि ताली कभी एक हाथ से नही बजती है लेकिन उन लोगों से ये पूछना चाहिए कि अगर एक बार को माना भी ले कि छोटे कपड़े वाली स्त्री या लड़की ने आपको उत्तेचित कर दिया तो क्या आपके भारतीय समाज का पारम्परिक पहनावा शूट और साड़ी पहने और अपना पूरा बदन ठके महिलाएं भी आपको उत्तेचित करती है , जो आप उनके साथ भी छेड़छाड़ की घटना को अन्जाम देते है । अक्सर दुहाई दी जाती है कि महिलाओं को ज्यादा संज-संवर कर बाहर नही आना चाहिए क्योकि इससे पुरुष उनके प्रति आकर्षित होते है । कितनी अजीब बात है कि पुरुषों द्वारा अपनी हर गलती के लिए कितनी आसानी से महिलाओं को जिम्मेदार करार दे दिया जाता है और खुद को निर्दोष साबित कर दिया जाता है ।

समाज का एक सबसे बड़ा दोगलापन तो उस समय सामने आता है जब वे महिलाओं को आरक्षण देने पर सामानता की बात कर महिलाओं को सशक्त साबित कर उनके आरक्षण की मांग मे हर तरह से अप्रत्यक्ष रुप से रोड़ा अटकाने का काम करते है तो दूसरी तरफ अगर महिलाएं उनके समकक्ष खड़ी हो जाती है तो उनके अहम को अच्छी खासी क्षति पहुँच जाती है । महिलाओं को अपने से कम आंकने वाले अधिकांश पुरुषो को सफर मे महिला कोच या महिला सीट पर सफर करने मे संकोच नही होता है और न ही महिलाओं के लिए आरक्षित लाइन मे खड़े होकर टिकट लेने मे उनके अहम को ठेस पहुँचती है ।

आप देवी की उपासना करिए पर ऐसी उपासना मत करिए जो आपको घर के अन्दर तक देवी का भक्त बनाए और बाहर निकलते ही महिषासुर का रुप प्रदान कर दे । शक्ति का स्वरुप माँ दुर्गा भी अपने भक्तों से बाहरी शुद्दीकरण की अपेक्षा आन्तरिक शद्दीकरण की उम्मीद करती है । हर महीने , हर दिन , हर घण्टे कही न कही बाल्ताकार , छेड़छाड़ की घटनाए सामने आती ही रहती है और हर दिन कोई न कोई रिर्पोट या आंकड़े आकर हमे अपने आप पर सोचने पर मजबूर करते है कि लेकिन क्या करे हम थोड़े भूलकर किस्म के समाज मे जो रहते हो जो आंकड़े को भूलने मे तनिक भी समय नही लगता है और उम्मीद बांधे बैठा रहता है कि हम अब तक विश्वगुरु है । जब हम विश्वगुरु थे तब समाज मे महिलाओं की स्थिति वाकई मे देवी के समान थी और महिषासुरो की कमी ती लेकिन आज अधिकांश लोग आन्तरिक महिषासुर का रुप धारण कर समाज मे घूम रहे है । जिस दिन ये महिषासुर समाज को आन्तरिक रुप से मुक्त कर देगे उस दिन हम लोग भारतीय समाज को एकबार फिर विश्वगुरु बना देगे ।

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